मेट्रो में सामने की सीट पर एक लड़का और एक लड़की बैठे थे. और दोनों ही जोर जोर हंस रहे थे. मेरी बगल वाली सीट पे एक 60-65 साल के बुजुर्गवार बैठे थै. बड़ी देर से दोनों को देख रहे थे. जब रहा नहीं गया तो मेरी और मुखातिब होकर बोले. देखिये ना, क्या जमाना आ गया है. ना शर्म। और न हया. एक हमारा जमाना था. औरत बिना परदे के घर के बाहर नहीं निकलती थी. और अब देखिये। हाथ में हाथ पकड़ कर हंसा जा रहा है. इतना भी नहीं सोचते की कौन क्या सोचेगा.
मैंने सर हिलाकर अपनी सहमति व्यक्त की. लड़का और लड़की पहले की ही तरह जोर जोर से हंस रहे थे. मानो दोनों को अमरता का वरदान मिल गया हो. भगवान् शिव से.
बुजुर्गवार कभी उन लड़के लड़की को देखते, और कभी मुझे. ना जाने कितनी चिंता की लकीरे उनके चेहरे पे खिंच आयीं थि. ऐसा लगा मानो उनके सामने अनके जमाने की मय्यत जा रही हो.
मेरा स्टेशन आ गया था. सो में ट्रेन से उतरा और अपने गंतव्य की और निकल पडा.
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